सिर्फ तुम समझते हो,
मैं हूँ क्या और कौन हूँ,
मैं साज़ हूँ या गूंज हूँ,
मैं आवाज़ की दोहराहत हूँ,
या फिर इक नयी आवाज़ हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
मेरा भी एक कल था
जो मेरे लिए मेरा पहला प्यार
मगर किसी के लिए सिर्फ खेल था
वो मेरा सच्चा प्यार नहीं मेरा बचपना था
खुश हूँ मैं बहुत की मुझे तुम जैसा तोहफ़ा मिला.
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं एक घर अपना छोड़ कर
एक घर अपना बनाने आई हूँ,
अपने हाथो की लकीरों पर
मेहंदी तुम्हारे नाम की लगा आई हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
कुछ शौक अपने छोड़ आई हूँ,
कुछ ख्वाबो को अपने साथ लायी हूँ,
थोड़ी सी जिंदगी ज़ी है मैंने
थोड़ी और तुम्हारे साथ जीना चाहती हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
मेरे ज़हन में चल रहे लाखो ख़याल
तुम्हारे कंधे पर सर रखते ही शांत हो जाते हैं,
डर हो या फिक्र तुम्हारी बाहों में
आते ही कही हवा हो जाते हैं.
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं साड़ी नहीं बाँध पाती हूँ,
खाना थोड़ा खराब बनाती हूँ,
कभी रोटी तो कभी दाल जलाती हूँ,
सब्ज़ी मे नमक डालना भूल जाती हूँ,
तुम्हारा टिफ़िन भी तैयार नहीं कर पाती हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं खाना तुम्हारे साथ ही क्यूँ खाती हूँ,
मैं पहला निवाला तुम्हें क्यूँ खिलाती हूँ,
हाथ में पानी का गिलास पकड़े क्यूँ रहती हूँ,
तुम्हारी तारीफ़ का इंतज़ार क्यूँ करती हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं पैसे चावल के डब्बे में क्यूँ छिपाती हूँ,
मैं औरो की तरह खर्चे नहीं करवाती हूँ,
नए हार या सोल्हा शृंगार का शौक नहीं
बस तुम्हारे लिए सजना चाहती हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
सुबह उठ कर मैं पहले तुम्हें क्यूँ देखती हूँ,
जागे होने पर भी सोने का नाटक क्यूँ करती हूँ,
तुम्हारी सुबह की कॉफी फीकी क्यूँ बनाती हूँ,
तुम्हारे अखबार को भी क्यूँ छिपाती हूँ
सिर्फ तुम समझते हो,
यूँ तुम्हें घंटो देखना
मेरी थकान उतार देता है,
एक शाम तुम्हारे बिना गुजारना
एक सदी सा लगता है.
सिर्फ तुम समझते हो,
तुम्हारी गाड़ी की आवाज़ सुन
मैं दरवाजे पर पहुंच जाती हूँ
तुम्हारे लिए नहाने का गरम पानी
रखना भी तो भूल जाती हूँ,
तुम्हारा पीछे से आकर मुझे
पकड़ने से मैं डर जाती हूँ,
तुम्हारे दिये तोहफे को पाकर
अपनी खुशी पाती हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं बाल तुम्हारे आगे ही क्यूँ सुखाती हूँ
तुम्हारे शर्ट के टूटे बटन को
पहने हुए ही क्यूँ लगाती हूँ,
मैं अपनी शर्म कैसे एक मुस्कान से छिपाती हूँ,
सिर्फ तुम समझते हो,
मेरे हाथ का साबुन मेरी पीठ तक नहीं जाता है,
मुझे तुमसे तौलिया मंगाने मे बड़ा मज़ा आता है,
मेरे जिस्म को देख मेरी आँखों को पढ़ते हो
मेरी कुछ अंकही ख्वाहिशों को भी
बस तुम ही समझते हो.
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं यूँ ही चलते-चलते कभी डर से तो कभी खुशी में
तुम्हें अपना हाथ थमाती हूँ,
मैं अपनी तबियत तुमसे क्यूँ छिपाती हूँ,
मैं अपनी भूख से कम क्यूँ खाती हूँ,
सिर्फ तुम समझते हो,
मेरी ठंड तुम्हारे coat को ओढ़ कर ही जाती हैं,
मुझे नींद तुम्हारे कंधे पर सर रख कर ही आती है,
मेरी खुशी तुम्हारे चेहरे को देखकर बढ़ जाती है,
तो मेरा गुस्सा तुम्हें देख शांत हो जाता है.
सिर्फ तुम समझते हो,
सब गलत समझे मुझे पर
तुम मुझे कभी गलत नहीं समझते
तुमसे कितना प्यार है मुझे इस बात पर
कभी सवाल नहीं करते,
औरो की उम्मीद नहीं तुम समझते हो
ये मेरे लिए काफी है,
ग़लती कोई भी हो मेरी तुम्हारे पास
मेरे हर ग़लती की माफी हैं.
सिर्फ तुम समझते हो,
मुझे मेरा घर भी याद आता हैं
बीता हैं बचपन जहाँ
वो बचपन भी याद आता हैं,
माँ की डांट और पापा का दुलार याद आता हैं.
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं जो अकेले में गाने गाती हूँ,
मैं चूहो से डर जाती हूँ,
सर्दियों की धूप में तुम्हारे साथ बैठ कर
घंटों बाते बनाती हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं तुम्हारे साथ झूमना चाहती हूँ,
मैं भी कभी तुम्हारे साथ
एक ही छाते मे होना चाहती हूँ,
किसी बारिश में तुम्हारे साथ भीगना चाहती हूँ
सिर्फ तुम समझते हो,
मैं एक बार तुम्हारी मूँछों को काटना चाहती हूँ,
एक बार तुम्हारी पीठ पर बैठना चाहती हूँ,
तो कभी तुमसे लिपट कर रोना चाहती हूँ.
सिर्फ तुम समझते हो,
सालो हो गए हमे मगर
अब भी तुम मुझे बखूबी समझते हो
हो चाहे हाल-ए-दिल मेरा या हरफ़ कोई अंकहा
उसे सिर्फ तुम समझते हो
सिर्फ तुम समझते हो.
Written by
ROY
Supbb bhai 👍👍👍👍👍
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